"क्या ये भारत की विडम्बना नही कि यहॉ लोग वोट उसे देते है जिसके जीतने के चान्स हो...उसे नही ,जिसे देना चाहते है....जिसे देना चाहिये..जिसके लिए दिल और दिमाग बार बार गवाही देता हो...हम खुद से तर्क करके कैसेे भी मना लेते है स्वयं को जीतने वाले की साइड में...उसकी सब बुराईयों को दरकिनार करके, महज इसलिए क्यूंकि वो जीत सकता है और जीत कर हम पर राज कर सकता है....ये सदियो से क्यूं एक हकीकत है कि हमें राजा चाहिये होता है, सेवक नही....क्यूं हमे दिये से बेहतर सूरज लगता है जबकि वो हर रात हमे अंधेरे मे छोड़ जाता है तन्हा, भटकने के लिए!
चमकती हुई चीजें जो चाहे छूयी ना जा सके पर लुभाती है हमें.....ये किस तरहा की मानसिकता है? अवसरवादिता और गुलामी इसी को कहते है ना...अपनी सुविधा से हर शर्त से समझोंता कर लेना....पर हम कर किसलिए लेते है ये समझोंते...और ये धोखा देते किसे है...सोच कर देखिये तो..!! क्या हम खुदपरस्ती और खोये हुए आत्मविश्वास की वजहा से हारे हुए है?? मत मानिए पर सच यही है!!!
चोर हो, बेइमान हो पर जीतने वाला होना चाहिये....हम सारी बहस और तर्क छोड़कर अंत मे अपना वोट बेकार नही होने देते ( जबकी हर बार हम उसे बेकार कर रहे होते है)..जैसे वोट नही कोई फिक्स डिपोजिट हो.!
और फिर वही जीतता भी है क्यूंकि हम जीता देते है...हमे उसके जीतने का विश्वास जो था..और फिर वही सब जैसा हमेशा से था...सवाल भी नही करते खुद से बाद में हम कि वोट खराब हुआ या नही....खुद के गुनाहो का पोस्टमार्टम करने की हिम्मत कहां होती है....
जरा सोचिये.....क्या करते है हम और क्यूं , किसके लिए...क्या किसी का सिर्फ जीत जाना हमारे लिए महत्वपूर्ण है? क्या चुनाव सिर्फ एक नेता का चुनना भर है?
चुनाव सिर्फ नेता का चुनना भर नही हो सकता...हमे इसे ऐसा बनने भी नही देना चाहिये! कोइ हमसे बड़ा नही है...ये ही तो लोकतंञ है...इसलिए "कौन जीत सकता है "से जरूरी है "कौन जीतना चाहिये" और एक सच्चे नागरिक की तरहा हमे सारे गणित और समीकरणो से इतर होकर उसे गर्व से वोट देना ही चाहिये...किसी भी शर्त पर....!
उम्मीद है आप इस बार ऐसा ही करेंगे...क्यूंकि ये ही धर्म है और ये ही सत्य भी.....आप ऐसा इसलिए भी करेंगे क्यूंकि आपको खुद के दिल की आवाज सुनने का हक है और यकीन मानिये आप जीते या हारे पर आपके जागने से
लोकतंञ जीत जायेगा!!"
डॉ विकास
चमकती हुई चीजें जो चाहे छूयी ना जा सके पर लुभाती है हमें.....ये किस तरहा की मानसिकता है? अवसरवादिता और गुलामी इसी को कहते है ना...अपनी सुविधा से हर शर्त से समझोंता कर लेना....पर हम कर किसलिए लेते है ये समझोंते...और ये धोखा देते किसे है...सोच कर देखिये तो..!! क्या हम खुदपरस्ती और खोये हुए आत्मविश्वास की वजहा से हारे हुए है?? मत मानिए पर सच यही है!!!
चोर हो, बेइमान हो पर जीतने वाला होना चाहिये....हम सारी बहस और तर्क छोड़कर अंत मे अपना वोट बेकार नही होने देते ( जबकी हर बार हम उसे बेकार कर रहे होते है)..जैसे वोट नही कोई फिक्स डिपोजिट हो.!
और फिर वही जीतता भी है क्यूंकि हम जीता देते है...हमे उसके जीतने का विश्वास जो था..और फिर वही सब जैसा हमेशा से था...सवाल भी नही करते खुद से बाद में हम कि वोट खराब हुआ या नही....खुद के गुनाहो का पोस्टमार्टम करने की हिम्मत कहां होती है....
जरा सोचिये.....क्या करते है हम और क्यूं , किसके लिए...क्या किसी का सिर्फ जीत जाना हमारे लिए महत्वपूर्ण है? क्या चुनाव सिर्फ एक नेता का चुनना भर है?
चुनाव सिर्फ नेता का चुनना भर नही हो सकता...हमे इसे ऐसा बनने भी नही देना चाहिये! कोइ हमसे बड़ा नही है...ये ही तो लोकतंञ है...इसलिए "कौन जीत सकता है "से जरूरी है "कौन जीतना चाहिये" और एक सच्चे नागरिक की तरहा हमे सारे गणित और समीकरणो से इतर होकर उसे गर्व से वोट देना ही चाहिये...किसी भी शर्त पर....!
उम्मीद है आप इस बार ऐसा ही करेंगे...क्यूंकि ये ही धर्म है और ये ही सत्य भी.....आप ऐसा इसलिए भी करेंगे क्यूंकि आपको खुद के दिल की आवाज सुनने का हक है और यकीन मानिये आप जीते या हारे पर आपके जागने से
लोकतंञ जीत जायेगा!!"
डॉ विकास