Sunday, 23 March 2014

vote ya fir sirf jeet


"क्या ये भारत की विडम्बना नही कि यहॉ लोग वोट उसे देते है जिसके जीतने के चान्स हो...उसे नही ,जिसे देना चाहते है....जिसे देना चाहिये..जिसके लिए दिल और दिमाग बार बार गवाही देता हो...हम खुद से तर्क करके कैसेे भी मना लेते है स्वयं को जीतने वाले की साइड में...उसकी सब बुराईयों को दरकिनार करके, महज इसलिए क्यूंकि वो जीत सकता है और जीत कर हम पर राज कर सकता है....ये सदियो से क्यूं एक हकीकत है कि हमें राजा चाहिये होता है, सेवक नही....क्यूं हमे दिये से बेहतर सूरज लगता है जबकि वो हर रात हमे अंधेरे मे छोड़ जाता है तन्हा, भटकने के लिए!
चमकती हुई चीजें जो चाहे छूयी ना जा सके पर लुभाती है हमें.....ये किस तरहा की मानसिकता है? अवसरवादिता और गुलामी इसी को कहते है ना...अपनी सुविधा से हर शर्त से समझोंता कर लेना....पर हम कर किसलिए लेते है ये समझोंते...और ये धोखा देते किसे है...सोच कर देखिये तो..!! क्या हम खुदपरस्ती और खोये हुए आत्मविश्वास की वजहा से हारे हुए है?? मत मानिए पर सच यही है!!!
चोर हो, बेइमान हो पर जीतने वाला होना चाहिये....हम सारी बहस और तर्क छोड़कर अंत मे अपना वोट बेकार नही होने देते ( जबकी हर बार हम उसे बेकार कर रहे होते है)..जैसे वोट नही कोई फिक्स डिपोजिट हो.!
और फिर वही जीतता भी है क्यूंकि हम जीता देते है...हमे उसके जीतने का विश्वास जो था..और फिर वही सब जैसा हमेशा से था...सवाल भी नही करते खुद से बाद में हम कि वोट खराब हुआ या नही....खुद के गुनाहो का पोस्टमार्टम करने की हिम्मत कहां होती है....
जरा सोचिये.....क्या करते है हम और क्यूं , किसके लिए...क्या किसी का सिर्फ जीत जाना हमारे लिए महत्वपूर्ण है? क्या चुनाव सिर्फ एक नेता का चुनना भर है?
चुनाव सिर्फ नेता का चुनना भर नही हो सकता...हमे इसे ऐसा बनने भी नही देना चाहिये! कोइ हमसे बड़ा नही है...ये ही तो लोकतंञ है...इसलिए "कौन जीत सकता है "से जरूरी है "कौन जीतना चाहिये" और एक सच्चे नागरिक की तरहा हमे सारे गणित और समीकरणो से इतर होकर उसे गर्व से वोट देना ही चाहिये...किसी भी शर्त पर....!
उम्मीद है आप इस बार ऐसा ही करेंगे...क्यूंकि ये ही धर्म है और ये ही सत्य भी.....आप ऐसा इसलिए भी करेंगे क्यूंकि आपको खुद के दिल की आवाज सुनने का हक है और यकीन मानिये आप जीते या हारे पर आपके जागने से
लोकतंञ जीत जायेगा!!"
डॉ विकास

anna ke liye


"आदरणीय अन्ना जी....कहॉ से शुरू करूं....पर कहना तो पड़ेगा...मोहब्बत जो की थी आपसे....हमने ही कहॉ था ना....अन्ना नही ये आंधी है, देश का दूसरा गॉधी है! तो हिसाब तो ये देश गॉधी तक से मॉग लेता है...आप तो अन्ना ही रह गये सर....गॉधी से बहुत दूर रह गये आप...हमने कोशिश की आपमें देख लें वो मूरत..महात्मा को देखा जो नही था हमारी जनरेशन ने सर...निरे मूर्ख साबित कर दिये आपने ...ये भी समझा दिया की प्रतीकों मे रूह नही लायी जा सकती है....कोई दूसरा गॉधी लाया नही जा सकता...वो खुद आता है....और आपको तो रालेगन सिद्धी से ले आया गया था ना...पर फिर भी मै एक मूर्ख होकर भी ये तो समझ ही जाता हूं सर कि इतिहास गॉधी बनने का मौका किसी विरले शख्स को ही देता है...आपको तो दिया था ना...आप क्यूं चूक गये सर???
क्यूं मिले थे आप सब लोग....आप तो ये तक भूल गये है सर?....क्यूं बार बार रास्ते बदलने पड़ते है आपको और आपके कुछ रीढ़हीन साथियो को....क्यूं मुझे और मुझ जैसे बहुत से लोगो को ये लगने लगा है कि आप पूरी शिद्दत से अगर कोशिश कर रहे है तो सिर्फ अपनी पहचान बचाने की?? जिस बात के लिए आप गॉधी के प्रतीक बने या बना दिये गये...वो बात तो मै , मेरा, हमारा और उनका मे बहुत पीछे़ छोड़ आये सर आप....आपने जिनको त्याग दिया है वो अर्जुन से लगते है और जिनसे आपको मोह है वो दुर्योधन की तरहा सामने आने लगे है...आप खुद गॉधी नही तो भीष्म जैसे ही बन जाते...आप तो जबसे टी वी पर एड में नजर आने लगे हो...जाने क्यूं महान नही लगते....त्यागी नही लगते...वैसे निडर नही लगते सर....लगता है कुछ अपना बचाना चाहते हो आप...इतिहास से कोई सस्ती उपमा नही दूंगा आपको...सम्मान किया है आपका...मोहब्बत भी की है....लेकिन सच कहे बिना भी नही रह सकता सर....सच कहता हूं इसलिए तो आपसे जुड़ा था और इसलिए ही अब आपको छोड़कर भी चला आया हूं, आपके त्यागे हुए कुछ अर्जुनो के साथ , उसी मकसद के लिए जिसके लिए आपको गॉधी बनाया गया था....अफसोस, आपने निऱाश किया सर!!!.....प्रणाम...आम आदमी!!"
डॉ विकास

khabar ke liye


"सुबह जब मेरी कम पढ़ी लिखी काम वाली बाई ने मेरे एक खबरिया चैनल देखने पर ये कहा कि " साब, होस्पिटल को टेम होगो, कछु ना रखो खबरन् में, सारी फर्जी है। पइसा बना रे है ये तो और आप लेट हो जाओगे।" तो मैं सदमें में आ गया और सुबहा से बार बार एक खतरनाक आंशका से घबराया हुआ हूँ और ये ब्लोग लिखकर मैं मेरी चिंता और मेरी बाई का अविश्वास इस लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ तक पहुचाना चाहता हूँ।
क्या समाचार मनोरंजन के लिए हो सकते है?
क्या समाचार और उन्हें बनाने वाले लोग किसी और ग्रह के है या कोई सुपर हुमन है जिनके हर सच और झूठ को सिर्फ स्वीकार कर लिया जाए और कुछ भी कहने सुनने और बना देने के बावजूद प्रतिक्रया देने का कोई माध्यम किसी पिड़ीत के पास शेष ना छोडा जाये?
क्यूँ किसी भी सच या झूठ के लिए इनकी जिम्मेदारी तय नही की जा सकती? नही करनी चाहिए? क्यूं किसी के इनके खिलाफ खडे हो जाने पर एक साथ लामबंद हो जाते है ये सब लोग? क्यूँ इन्हें सिर्फ सवाल पूछने की सुरक्षित सुविधा है और जबाव ना देने की स्वतंत्रता? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ऐसे ढाल बना कर कुछ रजनीगंधा छाप रिपोर्टर न्यूज चैनलों के रजनीकांत नही बन गये है।
ये कैसा चौथा स्तंभ है जो बुरादे से बना है और अपना कद संविधान से ऊपर कर चुका है। लेकिन जब मेरी बाई तक इनकी सच्चाई जानने का दावा करती है तो डर लगता है कि यह बुरादे का खम्भा यकीनन ढहने वाला है और इसलिए ही शायद इनकी लामबंदी और ज्यादा गहरी हो रही है औऱ इस तरह ये अपनी अर्थी के खंभे खुद उठा रहे है स्वाहा होने के लिए।खबर जब विश्वास खो दे तो उसका अंतिम संस्कार हो ही गया मानिए।
मुझे परेशानी इस बात से है कि जब कोई खंभा टूटता है तो इमारत भी ढह जाती हैं इसलिए क्यूं ना तर्क हो, चर्चा हो, आंदोलन हो इस बुरादे के स्तंभ को मजबूत करने के लिए? क्यूँ नहीं इनकी भी जिम्मेदारी तय हो भारत के लोकतंत्र के हर स्तंभ की मानिन्द? क्यूँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर लोगों के विश्वास से खेलने वाले इस खेल को बंद करके खबरो की नैतिकता को किसी आकाशवाणी जैसा बना देने के प्रयास ना किया जाए??
क्यूँ कि खबर कोई मनोरंजन नही हो सकती, खबर किसी सुधीर चौधरी,चौरसिया, वाजपेयी या ओम कश्यप का निजी विचार नही हो सकती। खबर होती है सच का आईना और इसलिए खबर का सही होना और सही पहुंचना,किसी घिनौने व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जियादा किसी आम आदमी का अधिकार है।
इसलिए किसी भी विरोध के खिलाफ लामबंद होने से पहले अपनी गिरेबान मे झांके मेरे खबरिया दोस्तों, यकीन मानिए आप विश्वास खो चुके हो। हो सके तो गलत लोगो का विरोध करिये, कम से कम उनके साथ खडे होने से डरिये। लोकतंत्र फिर से किसी आकाशवाणी को पुकार रहा है।"
डॉ विकास